योगसूत्र (पतञ्जलि) – प्रथम: समाधिपादः । सूत्र ११ – २0 ।

अनुभूतविषयासंप्रमोषः स्मृतिः ॥ ११ ॥

अनुभव किये हुए विषयों का न छुपना अर्थात प्रकट हो जाना स्मृति है ॥ ११ ॥

स्मृति में पुरानी बातें याद आती हैं । कुछ अनुभव जो कि मस्तिष्क में छुपे हुये हैं , मानस पटल पर प्रकट हो जाते हैं । इनके फलस्वरुप स्मृत्ति वृत्तियाँ पैदा होती हैं ।

अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः ॥ १२ ॥

वृत्तियों का निरोध अभ्यास एवं वैराग्य से होता है ॥ १२ ॥

यह कहने के बाद कि योग चित्त की वृत्तियों का निरोध है , ऋषि पतंजलि ने पाँच वृत्तियों का वर्णन किया । ये वृत्तियाँ हैं – प्रमाण , विपर्यय , विकल्प , निद्रा एवं स्मृति । क्लिष्ट वृत्तियाँ अक्लिष्ट वृत्तियों के द्वारा समाप्त की जा सकती हैं । योगी ऐसा अभ्यास एवं वैराग्य से कर सकता है । अगले सूत्रॉं में अभ्यास एवं वैराग्य की व्याख्या की गयी है ।

तत्र स्थितौ यत्नोऽभ्यासः ॥ १३ ॥

वह अर्थात वृत्तियाँ यत्न पूर्वक अभ्यास से स्थित हो जाती हैं ॥ १३ ॥

यहाँ पर यत्न का अर्थ लगातार प्रयास करने से है । अभ्यास का अर्थ है – किसी कार्य को अनंतर करते रहना ।

स तु दीर्घकालनैरन्तर्यसत्कारासेवितो दृढभूमिः ॥ १४ ॥

और , वह, अर्थात अभ्यास , लम्बे समय तक लगातार आदरपूर्वक करने पर दृढ होते जाता है ॥ १४ ॥

अभ्यास के विभिन्न अंग हैं – दीर्घ काल तक योग करना , योग के प्रति श्रद्धा रखना एवं निरंतर योग करना । ऐसा करने से जिसका अभ्यास किया जाता है , वह दृढ हो जाता है ।

दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य वशीकारसंज्ञा वैराग्यम् ॥ १५ ॥

देखे और सुने हुए विषयों के प्रति तृष्णा , अर्थात लगाव , के अभाव के वशीभूत हो जाना वैराग्य है ॥ १५ ॥

वैराग्य का अर्थ है – राग का अभाव । इन्द्रियों से जब विषयों का अनुभव होता है , तब वो चित्त में राग पैदा करते हैं । व्यक्ति सुख एवं दुख के थपेडे खाते रहता है । वैराग्य का अर्थ है कि विषयों से पैदा होने वाले लगाव को न आने देना । ऐसे लगाव से मोह होता है , जो योगाभ्यास में बाधक है । इसका अर्थ यह भी नहीं है कि विषयों को देखा और सुना न जाये । यह तो अवश्यंभावी है । सिर्फ विषयों के प्रति तृष्णा नहीं होने देना चाहिये ।

तत्परं पुरुषख्यातेर्गुणवैतृष्ण्यम् ॥ १६ ॥

तब परम पुरूष दिखता है , और गुणों से वितृष्णा आ जाती है ॥ १६ ॥

प्रकृति में तीन प्रकार के गुण होते हैं – सत्त्व , रजस एवं तमस। प्रक़ृति को देखने एवं सुनने से विषय मन में तृष्णा पैदा करते हैं । ये तृष्णा व्यक्तिगत गुणों के प्रभाव से उत्पन्न होता है । वैराग्य से इस तृष्णा का नाश होता है । इससे चित्त की वृत्तियाँ समाप्त होने लगती हैं , एवं परम पुरुष दिखने लगता है ।

वितर्कविचारानन्दास्मितारूपानुगमात् संप्रज्ञातः ॥ १७ ॥

सम्प्रज्ञात में वितर्क , विचार , आनन्द एवं अस्मिता का अनुगमन होता है ॥ १७ ॥

सम्प्रज्ञात में चार प्रकार की भावनाएँ है – वितर्क , विचार , आनन्द एवं अस्मिता । वितर्क में बुद्धि तर्क से विषयों का विष्लेषण करती है । विचार में मन विषयों के बारे में सोचता है । सम्प्रज्ञात योग में वितर्क एवं विचार से अक्लिष्ट वृत्तियाँ जन्म लेती हैं । इनसे चित्त में आनन्द का भाव पनपता है । तत्पश्चात अस्मिता का भाव भी आता है , जिसमें आत्मस्वरुप का ज्ञान होने लगता है ।

विरामप्रत्ययाभ्यासपूर्वः संस्कारशेषोऽन्यः ॥ १८ ॥

पहले प्रत्यय में विराम आता है , और सिर्फ संस्कार शेष रहते हैं ॥ १८ ॥

यहाँ पर प्रत्यय का अर्थ विषयों के अनुभव से उत्पन्न होने वाले संचित अनुभव से है । विषय ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा अनुभव किये जाते हैं , और अंतत: चित्त में वृत्तियों को उत्पन्न करते हैं । विषय रुप , शब्द , गंध , स्वाद एवं स्पर्श से उत्प्न्न होते हैं । सम्प्रज्ञात योग के अभ्यास से पहले प्रत्यय समाप्त हो जाता है । इस समय संस्कार विद्यमान होते हैं । संस्कार मनोमय कोश में प्रसुप्त अवस्था में विद्यमान होते हैं । ये विशेष परिस्थिति में व्यक्ति विशेष के स्वभाव में उभर कर आते हैं । संस्कार प्रत्यय से बनता है ।

भवप्रत्ययो विदेहप्रकृतिलयानाम् ॥ १९ ॥

विदेह में , अर्थात देह न रहने , पर भवप्रत्यय प्रकृति में लीन हो जाते हैं ॥ १९ ॥

भवप्रत्यय का अर्थ संचित अनुभवों से है । ये कर्म से प्रभावित होते हैं । ऐसे प्रत्यय मृत्यु के पश्चात भी प्रकृति में विद्यमान रहते हैं । देहावसान के बाद प्रकृति में लीन ये विकार पुनर्जन्म से दूसरे देह में संलग्न हो जाते हैं ।

श्रद्धावीर्यस्मृतिसमाधिप्रज्ञापूर्वक इतरेषाम् ॥ २० ॥

दूसरे योगी श्रद्धा , वीर्य , स्मृति , समाधि एवं प्रज्ञा से होते है ॥ २० ॥

योगी जो विदेह नही हैं , उनके लिये श्रद्धा , वीर्य , स्मृति , समाधि एवं प्रज्ञा का सहारा लेना चाहिये । श्रद्धा से अर्थ है – मन में विश्वास का होना । अगर योग में श्रद्धा न हो , तो योग का असर कम होता है । उसके लिये पहले श्रद्धा बनानी चाहिये । वीर्य का अर्थ मन एवं शरीर के सामर्थ्य से है । सामर्थ्य न हो तो यौगिक क्रियायें नहीं किये जा सकते है । स्मृति से बौद्धिक शक्ति का सामर्थ्य पता चलता है । अगर योग की कोई पद्धति पढी गयी हो तो उसका दिन – रात स्मरण रखना आवश्यक है । समाधि में चित्त से लेकर मन , बुद्धि , प्राण एवं शरीर एक हो जाते है । इस एकता में साक्षात ईश्वर का अनुभव होता है । प्रज्ञा से अर्थ एक ऐसे बुद्धि से है , जिसमें ईश्वर का ज्ञान समाहित हो गया हो । योग से विवेक उत्पन्न होता है । विवेक से ईश्वर ज्ञान होता है , जिससे प्रज्ञा उत्पन्न होता है ।