योगसूत्र (पतञ्जलि) – द्वितीयः साधनपादः । सूत्र ११ – २० ।

ध्यानहेयास्तद्वृत्तयः ॥ ११ ॥

वो वृत्तियाँ ध्यान से कम हो जाती हैं ।

पिछले सूत्रों में पाँच वृत्तियाँ बतायी गयी है – अविद्या , अस्मिता , राग , द्वेष और अभिनिवेश । इन वृत्तियों की उत्पत्ति पुराने संस्कारों से होती है । ध्यान से ये क्लेश रुपी वृत्तियाँ क्षीण होते जाती है । ध्यान में शांत रुप से अंतर्मुखी होकर मन में उठने वाले विचारों को देखा जाता है । इससे ये विकार स्वयं कम होने लगते हैं ।

क्लेशमूलः कर्माशयो दृष्टादृष्टजन्मवेदनीयः ॥ १२ ॥

कर्माशय ही क्लेष का मूल है , इसकी वेदना दृष्ट अर्थात वर्तमान या अदृष्ट अर्थात अगले जन्मों में व्यक्त होगी ।

कर्माशय का अर्थ है – संचित भूतपूर्व कर्म । क्लेश वृत्तियाँ इन्हीं से निकलती हैं । ये आशय इस जन्म में , नहीं तो अगले जन्मों में प्रकट होती हैं । दृष्ट वर्तमान जन्म से है , क्योंकि वह दिखायी दे रहा है । अदृष्ट अगले जन्मों से है , क्योंकि वह अभी पता नहीं चलता ।

सति मूले तद्विपाको जात्यायुर्भोगाः ॥ १३ ॥

इस मूल से जाति , आयु एवं भोग का विपाक होता है ।

कर्माशय से अर्थ संचित कर्मों से है । जब तक इन मूलों का अस्तित्व है , जन्म , मरण एवं भोग का चक्र चलता रहता है । जाति का अर्थ जन्म से है । आयु का अर्थ यहाँ पर जीवित अवस्था से है । आयुहीन का अर्थ मरण से है । जब तक आयु है , भोग का क्रम चलता रहता है । ये अनुभव कर्माशय मूल से उत्पन्न होते हैं । जब तक कर्माशय संचित है , यह चक्र चलता रहता है ।

ते ह्लादपरितापफलाः पुण्यापुण्यहेतुत्वात् ॥ १४ ॥

इन पुण्य एवं अपुण्य कारणों से आह्लाद एवं परिताप होता है । भोग या तो पुण्य रुप के हैं , अथवा अपुण्य रुप के हैं । इनसे खुशी या गम होता है । परंतु ये आह्लाद एवं परिताप दुख के ही रुप हैं । यह अगले सूत्र में बताया गया है ।

परिणामतापसंस्कारदुःखैर्गुणवृत्तिविरोधाच् च दुःखम् एव सर्वं विवेकिनः ॥ १५ ॥

परिणाम ताप, संस्कार से दुख एवं गुण तथा वृत्ति के विरोध से दुख – विवेकी सर्वत्र दुख देखता है । परिणाम ताप से अर्थ कर्म के फलस्वरुप हुये दुख से है । संस्कार कर्माशय से होता है । संस्कार से भी अनुभव दुख प्रतीत होते हैं । गुण और वृत्ति के विरोध से भी दुख होता है । विवेकी सर्वत्र दुख देखता है ।

हेयं दुःखम् अनागतम् ॥ १६ ॥

अनागत दुख हेय है । जो दुख अब तक नही आया है , उससे बचा जा सकता है ।

द्रष्टृदृश्ययोः संयोगो हेयहेतुः ॥ १७ ॥

द्रष्टा एवं दृष्य के संयोग से यह हेय है ।

अगर द्र्ष्टा एवं दृष्य का संयोग हो जाये , तो उससे अनागत दुख समाप्त हो जाते हैं । जब तक चित्त में वृत्तियाँ हों , दृष्य द्र्ष्टा के संस्कार भावों से प्रभावित है । इस समय द्र्ष्टा एवं दृष्य भिन्न हैं । जब चित्त की वृत्तियाँ समाप्त हो जाती हैं , तो अनागत दुख दुखभाव नहीं देता । इस समय द्र्ष्टा एवं दृष्य़ का संयोग हो गया रहता है ।

प्रकाशक्रियास्थितिशीलं भूतेन्द्रियात्मकं भोगापवर्गार्थं दृश्यम् ॥ १८ ॥

दृश्य प्रकाश , क्रिया एवं स्थिति के चरित्र , भूत एवं इन्द्रियों, और भोग एवं अपवर्ग के अर्थ से बनता है ।

दृश्य अर्थात जो दिखायी देता हो – वह प्रकाश , क्रिया एवं स्थिति के चरित्र से बना है । गुण तीन प्रकार के हैं – सत , रज एवं तम । सद्गुण प्रकाश के चरित्र का है । इस गुण में मन का अन्धकार समाप्त होने लगता है । राजसी गुण व्यक्ति को कर्म करने के लिये उत्साहित करते हैं । यह क्रिया से सम्बंधित है । तामसी गुण में आलस्य , क्रोध के वजह से मन एवं शरीर भारी रहता है । ऐसा लगता है कि देह भारी होकर स्थिर हो गया हो । दृश्य इन तीन प्रकार के चरित्र से समाहित है । दृश्य में भूत अर्थात पदार्थ एवं इन्द्रियों द्वारा उनका अनुभव सम्मिलित है । कर्मेन्द्रियों एवं ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा दृश्य का अनुभव होता है । भोग अर्थात विषयों का भोग करना एवं अपवर्ग अर्थात उनको छोड देना भी दृश्य के अंतर्गत आते हैं ।

विशेषाविशेषलिङ्गमात्रालिङ्गानि गुणपर्वाणि ॥ १९ ॥

विशेष , अविशेष , लिंगमात्र , एवं अलिंग – ये गुण के पर्व हैं । पर्व का अर्थ अवस्था से है । गुण विशेष अथवा अविशेष होता है । यह लिंग और अलिंग रुप में भी प्रकट होता है । इस सूत्र में यह बताया जा रहा है कि दृष्य गुण के इन अवस्थाओं से बनता है ।

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