योगसूत्र (पतञ्जलि) – द्वितीयः साधनपादः। सूत्र ४१ – ४९ ।

सत्त्वशुद्धिसौमनस्यैकाग्र्येन्द्रियजयात्मदर्शनयोग्यत्वानि च ॥ ४१ ॥

इसके अलावा , सत्त्व , शुद्धि , सौमनस्य , एकाग्रता , इन्द्रियों पर विजय एवं आत्मदर्शन की योग्यता भी आती है ।

शौच से और भी कई योग्यताओं की प्राप्ति होती है । इससे सत्व अर्थात सत्यभाव उत्पन्न होने लगता है । शुद्धि से तात्पर्य शुद्ध अर्थात साफ अस्तित्व से है । सौमनस्य में विपरीत परिस्थितियों में भी शांत भाव बना रहता है । एकाग्र होने से जिस कर्म का सम्पादन हो रहा हो , सिर्फ उसी पर मन लगा रहता है । अपने अंगों से वैराग्य उत्पन्न हो जाने पर इन्द्रियाँ देह को प्रभावित करने में असफल हो जाती हैं, और अंततः इन्द्रियों पर पूर्ण विजय प्राप्त हो जाता है । इससे चित्त शांत होने लगता है , और आत्मदर्शन की योग्यता आती है ।

संतोषाद् अनुत्तमः सुखलाभः ॥ ४२ ॥

संतोष से अत्युत्तम सुख का लाभ होता है ।

संतोष से जितना हो , उसी में सुखपूर्वक रहने की इच्छा होती है । और विषयों पर मन नहीं भागता , और इससे अनुत्तम सुख का लाभ होता है ।

कायेन्द्रियसिद्धिरशुद्धिक्षयात् तपसः ॥ ४३ ॥

तप से अशुद्धि कम होता है , जिससे देह और इन्द्रियों की सिद्धि हो जाती है ।

जैसे सोने को गर्म करने पर उसमें से उसकी अशुद्धि निकल जाती है , उसी प्रकार तप देह एवं मन के विकारों को समाप्त कर देता है । तप में विपरीत परिस्थितियों में भी अपने धर्म का अनुशरण किया जाता है । इस धर्म का जाति से कोइ संबंध नहीं है । यह धर्म आपका व्यवसाय , नौकरी , गृहकार्य , पढाई , पुत्र धर्म , पति धर्म , माता धर्म , पिता धर्म , कुछ भी हो सकता है । स्वानुशासन से इनका पालन करना तप है । इससे अशुद्धि कम हो जाती है , एवं देह एवं इन्द्रियों की सिद्धि हो जाती है । यह तप एक प्रकार का कर्म योग है ।

स्वाध्यायाद् इष्टदेवतासंप्रयोगः ॥ ४४ ॥

स्वाध्याय से इष्ट देवता की प्राप्ति हो जाती है ।

स्वाध्याय में स्वयं आप्त अथवा अन्य धर्मानुकूल ग्रंथों का अध्ययन किया जाता है । इससे जो ईष्ट अर्थात जिसे प्राप्ति की इच्छा हो , वह मिलने लगता है । यह एक प्रकार का ज्ञान योग है । स्वाध्याय से ज्ञान उत्पन्न होने लगता है , जिससे फिर इष्ट देवता की प्राप्ति होने लगती है ।

समाधिसिद्धिरीश्वरप्रणिधानात् ॥ ४५ ॥

ईश्वर प्रणिधान से समाधि की सिद्धि हो जाती है ।

ईश्वर प्रणिधान का अर्थ है , अपने प्राणों को ईश्वर में अर्पित कर देना । यह भक्तियोग का मार्ग है । इससे समाधि की भी सिद्धि हो सकती है , क्यों कि , करुणामय ईश्वर , प्राणों के अर्पित होने पर, मन को निर्मल करने में सहायक होते हैं । इससे चित्त शांत होने लगता है एवं समाधि की सिद्धि होने लगती है ।

स्थिरसुखम् आसनम् ॥ ४६ ॥

सुखपूर्वक स्थिर होना आसन है |

आसन में देह का स्थिर होना जरुरी होता है । इस स्थिति में देह को सुख होना चाहिये । यहाँ पर किसी विशेष आसन की बात नहीं की गयी है । परंतु अगर लंबे समय तक सुखपूर्वक स्थिर होना हो , तो यह आवश्यक है कि रीढ की हड्डी सीधी हो । ऐसे आसन भी हैं , जो देह को सुदृढ बनाते है , एवं हठयोग में उनका विशेष वर्णन है ।

प्रयत्नशैथिल्यानन्तसमापत्तिभ्याम् ॥ ४७ ॥

इसमें प्रयत्न में शिथिलता से अनंत की समापत्ति हो जाती है ।

आसन में बैठने पर प्रयत्न नहीं होना चाहिये । ऐसे आसन में बैठने पर फिर प्रयत्न करने की आवश्यकता नहीं होती है । इससे शरीर शिथिल होने लगता है, तत्पश्चात अनंत का आभास होने लगता है ।

ततो द्वन्द्वानभिघातः ॥ ४८ ॥

तब द्वन्द्वों से आघात नहीं होता ।

आसन में स्थिर हो जाने पर, द्वन्द्व भाव विचलित नहीं करते । चाहे सुखपूर्वक भाव उठे अथवा दुख पूर्वक भाव उठे , आसन में स्थित पुरुष का चित्त स्थ्रिर रहता है । द्वन्द्व परिस्थितियों में भी वो विचलित नहीं होते ।

तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायामः ॥ ४९ ॥

इसमें स्थिर हो जाने के बाद श्वास एवं प्रश्वास में रुकना प्राणायाम है ।

श्वास का अर्थ है – सांस का अन्दर लेना । प्रश्वास का अर्थ है – सांस को बाहर छोडना । आसन में स्थिर हो जाने पर श्वास – प्रश्वास की प्रक्रिया पर निय़ंत्रण रखना प्राणायाम है । प्राण का सीधा संबंध सांस से है । प्राणायाम में श्वास एवं प्रश्वास का नियंत्रित तरीके से अभ्यास किया जाता है ।

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