योगसूत्र (पतञ्जलि) – प्रथम: समाधिपादः । सूत्र ४१ – ५१ ।

क्षीणवृत्तेरभिजातस्येव मणेर्ग्रहीतृग्रहणग्राह्येषु तत्स्थतदञ्जनतासमापत्तिः ॥ ४१ ॥

वृत्तियो के क्षीण हो जाने पर समापत्ति उत्पन्न होती है , जिसमें ग्रहीता , ग्रहण एवं ग्राह्येषु में स्थिर वैसा ही स्वरुप ले लेता है , जैसा पवित्र मणि लेता है ।

वृत्तियों के कमजोर हो जाने पर मन शांत हो जाता है । ऐसी स्थिति में जैसे पवित्र मणि वाह्य स्वरुप का बिना किसी अपरुप के , सही प्रतिबिम्ब दिखाता है , वैसे ही चित्त भी सही रुप को देखना शुरु कर देता है । इस दृष्टि के तीन अंग हैं – ग्रहीता , ग्रहण एवं ग्राह्य । ग्राह्य से अर्थ अनुभूत विचारों से है । किसी विषय से जो अनुभव मन एवं बुद्धि में पैदा होते हैं , वो ग्राह्य है । ग्रहीता कर्ता का रुप है । ग्रहण ग्रहीता द्वारा ग्राह्य के अनुभव करने की क्रिया है । वृत्तियों के क्षीण हो जाने, ग्रहीता को ग्राह्य का जैसा रुप है , वैसा ही दिखने लिगता है ।

तत्र शब्दार्थज्ञानविकल्पैः संकीर्णा सवितर्का समापत्तिः ॥ ४२ ॥

तब शब्द , अर्थ एवं ज्ञान के विकल्प से संकीर्ण समापत्ति सवितर्क है । चित्त के शांत हो जाने पर जब शब्द , अर्थ एवं ज्ञान के विकल्पों पर ध्यान दिया जाये , तो सवितर्क समापत्ति होती है । इसमें शब्दों के सही अर्थ का ज्ञान होता है । इस प्रकार के ज्ञान में चित्त में वृत्तियाँ नहीं पैदा होतीं । इसमें ग्राह्य शब्दों का सही रुप दिखता है , एवं सद्ज्ञान होता है । सवितर्क एवं निर्वितर्क समाधि में वाह्य स्थूल वस्तुवों के अनुभव की बात की गयी है । ये अनुभव पाँच ज्ञानेन्द्रियों , आँख , नाक , मुँह , कान एवं त्वचा से होता है । ये शब्द , अर्थ एवं ज्ञान के विकल्प में बदलती हैं । सवितर्क समाधि मॆं शब्दों का ज्ञान होता है , एवं सही अर्थ का पता चलता है ।

स्मृतिपरिशुद्धौ स्वरूपशून्येवार्थमात्रनिर्भासा निर्वितर्का ॥ ४३ ॥

निर्वितर्क समापत्ति में स्मृति के परिशुद्ध हो जाने पर स्वरुप शून्य हो जाता है , केवल अर्थ का ही भास होता है ।

निर्वितर्क समापत्ति में स्मृति शुद्ध हो जाती है । इससे वस्तु विशेष का रुप शून्य की भाँति हो जाती है । स्मृतियाँ पुराने संस्कारों से बनी होती हैं । अत: प्रायः अनुभव स्मृतियों से उत्पन्न होते हैं । चित्त वृत्तियों के क्षीण होने के पश्चात अर्थ पर स्मृतियों का प्रभाव नहीं पडता , क्यों कि वे समाप्त हो गयी रहती हैं । तत्पश्चात सही अर्थ दिखायी देने लगता है । यह निर्वितर्क समाधि है । तन्मात्राओं से प्राप्त हुआ अर्थ निर्वितर्क समाधि में स्मृति से प्रभावित नहीं होता ।

एतयैव सविचारा निर्विचारा च सूक्ष्मविषया व्याख्याता ॥ ४४ ॥

इसी प्रकार से सूक्ष्म विषयों की व्याख्या सविचार एवं निर्विचार में है ।

सवितर्क एवं निर्वितर्क समाधि में वाह्य स्थूल वस्तुवों के अनुभव की बात की गयी है । सविचार एवं निर्विचार समाधि में सूक्ष्म विषयों की बात की गयी है । सूक्ष्म विषयों में दृष्टि , गंध , रस , श्रवण एवं स्पर्श की तन्मात्रायें , मन एवं अहंकार सम्मिलित है । सविचार समाधि में सूक्ष्म विषयों के सही अर्थ का पता चलता है । निर्विचार समाधि में ये अर्थ भी समाप्त हो जाते हैं , और चित्त परिशुद्ध हो जाता है ।

सूक्ष्मविषयत्वं चालिङ्गपर्यवसानम् ॥ ४५ ॥

तथा सूक्ष्म विषय अलिंग एवं पर्यवसानम है ।

अलिंग से अर्थ है – वाह्य स्वरुप का अभाव होना । सूक्ष्म विषयों के वाह्य स्वरुप नहीं होते हैं । वे पर्यवसानम हैं – अर्थात प्रकृति में समाहित रहते हैं । जैसे कि विभिन्न तन्मात्रायें प्राकृतिक अनुभव से ही पैदा होती हैं ।

ता एव सबीजः समाधिः ॥ ४६ ॥ ये सभी सबीज समाधि है । सवितर्क , निर्वितर्क , सविचार एवं निर्विचार – ये सारी समाधियाँ सबीज हैं । इनमें चित्त निर्मल एवं शुद्ध हो जाता है , परंतु इन सारी वृत्तियों में अभी भी ध्येय पदार्थ की चित्त वृत्तियाँ शेष रहती हैं ।

निर्विचारवैशारद्येऽध्यात्मप्रसादः ॥ ४७ ॥

निर्विचार की पवित्रता में अध्यात्म प्रसन्न होता है ।

निर्विचार समाधि में अध्यात्म ज्ञान उत्पन्न होने लगता है ।

ऋतंभरा तत्र प्रज्ञा ॥ ४८ ॥

तब प्रज्ञा ऋतंभरा हो जाती है ।

प्रज्ञा तब सत्य पर आधारित हो जाती है । अब प्रज्ञा को सही रुप दिखायी देने लगता है ।

श्रुतानुमानप्रज्ञाभ्याम् अन्यविषया विशेषार्थत्वात् ॥ ४९ ॥

इसमें विषयों का अर्थ श्रुत (सुने हुए ) , अनुमानित ( अनुमान किये हुए ) एवं प्रज्ञा से प्राप्त अनुभओं से अलग एवं विशेष होता है |

ऋतंभरा में प्राप्त अनुभव विशेष एवं भिन्न होते हैं । यह सुने हुये , अनुमान किये हुये एवं साधारण अनुभवों से अलग होते हैं ।

तज्जः संस्कारोन्यसंस्कारप्रतिबन्धी ॥ ५० ॥

तब उत्प्न्न संस्कार अन्य संस्कारों को समाप्त कर देते हैं । इस समाधि में उत्पन्न होने वाले संस्कार अन्य संस्कारों को समाप्त कर देते हैं । तब कोई संस्कार शेष नहीं रह जाते एवं चित्तवृत्तियाँ पूर्णतः समाप्त होने लगती हैं ।

तस्यापि निरोधे सर्वनिरोधान् निर्बीजः समाधिः ॥ ५१ ॥

जब वह संस्कार भी समाप्त हो जाता है , सब संस्कार समाप्त हो जाते हैं , वह निर्बीज समाधि है । निर्बीज समाधि में सब संस्कार समाप्त हो जाते हैं । चित्तवृत्तियाँ पूर्णतः समाप्त हो जाती हैं ।

इति पतञ्जलिविरचिते योगसूत्रे प्रथमः समाधिपादः ।

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