योगसूत्र (पतञ्जलि) – प्रथम: समाधिपादः । सूत्र २१ – ३०।

तीव्रसंवेगानाम् आसन्नः ॥ २१ ॥

तीव्र संवेग से शीघ्र होता है ।

यदि प्रयास तीव्र एवं जोर का हो , तो प्रज्ञा शीघ्र उत्पन्न होती है । तेजी से चलता हुआ योगाभ्यास शीघ्र सिद्ध होता है ।

मृदुमध्याधिमात्रत्वात् ततोऽपि विशेषः ॥ २२ ॥

उनमें भी मृदु , मध्य एवं उच्च का भेद हो जाता है ।

तीव्र संवेग वालों में भी किस प्रकार का अभ्यास है , उससे अंतर पड जाता है । अगर उच्च कोटि का प्रयास हो तो सिद्धि शीघ्र होती है । मध्य एवं मृदु कोटि के प्रयास ज्यादा समय लेते हैं ।

ईश्वरप्रणिधानाद् वा ॥ २३ ॥

अथवा , ईश्वर प्रणिधान से भी होता है ।

योगाभ्यास ईश्वर को प्राण समर्पित करने से भी होता है । ईश्वर के प्रति भक्ति हो , और श्रद्धापूर्वक समर्पण किया जाये तो उससे भी योग शीघ्र होता है ।

क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः ॥ २४ ॥

क्लेश , कर्म , विपाक और आशय से जो विशेष पुरूष अपरामृष्ट हो वह ईश्वर है ।

इस सूत्र तथा अगले सूत्रों में ईश्वर की व्याख्या है । ईश्वर एक विशेष प्रकार का पुरूष है । वह क्लेश , कर्म , विपाक एवं आशय से प्रभावित नहीं होता । क्लेश ऐसे अनुभवों को कहते हैं , जिनसे चित्त की वृत्तियाँ बढ्ती हैं । ईश्वर पर क्लिष्ट वृत्तियों का प्रभाव नहीं होता । क्लेश दुख एवं कष्ट देता है । कर्म से साधारण पुरूष सुख एवं दुख का अनुभव करते हैं , और कर्म से आसक्ति कर लेते हैं । कर्म के फलीभूत होने की आसक्ति विपाक से सम्बंधित है । ईश्वर कर्म फल के प्रति आसक्त नहीं होता । कर्म से उत्पन्न होने वाले अनुभवों को भी संचित नहीं रखता । आशय का अर्थ है , कर्म से होने वाले अनुभवों को हृदय में संचित रखना । अर्थात कर्म से उत्पन्न होने वाले विपाक एवं आशय से ईश्वर अनासक्त है ।

तत्र निरतिशयं सर्वज्ञ्त्वबीजम् ॥ २५ ॥

वह सब ज्ञान का बीज है और उससे कोई अतिशय नहीं है ।

ईश्वर को सर्वज्ञान है । उससे बढकर भी कोई नहीं । अतिशय का अर्थ है – ज्यादा । ईश्वर से ज्यादा ज्ञानी कोई नहीं ।

स पूर्वेषाम् अपि गुरुः कालेनानवच्छेदात् ॥ २६ ॥

काल से भी अनवच्छेदित , वह पूर्वजों का भी गुरू है ।

ईश्वर काल से परे है । जब काल अर्थात समय भी नहीं था , उस समय भी ईश्वर की सत्ता व्याप्त थी । वह प्रथम गुरू है । पूर्वजों को भी उसने प्रथम शिक्षा दी थी । ईश्वर अनादि है , वह अमर है ।

तस्य वाचकः प्रणवः ॥ २७ ॥

प्रणव अर्थात ॐ उसका वाचक है ।

यहां वाचक का अर्थ उस शब्द से है , जो ईश्वर की बात करता हो । ॐ ईश्वर का नाम है । यह ध्वनि में ईश्वर का मूर्त रुप है ।

तज्जपस्तदर्थभावनम् ॥ २८ ॥

उसके अर्थ के भाव के साथ उसका जप करो ।

योगी को प्रणव का जप करना चाहिये । और उसके साथ उसके अर्थ के भाव का भी स्मरण करना चाहिये । इसी को प्रारम्भ में ईश्वर प्रणिधान भी कहा गया । प्रणव के जाप एवं स्मरण से ईश्वर के प्रति भक्ति एवं समर्पण बढता है ।

ततः प्रत्यक्चेतनाधिगमोऽप्यन्तरायाभावश्च ॥ २९ ॥

उससे अंतरात्मा की चेतना का ज्ञान एवं विघ्नों का अभाव अर्थात अंत हो जाता है । ईश्वर प्रणिधान से अन्दर की चेतना जागृत हो जाती है । उपर के सूत्रों में कुछ उपायों का वर्णन है , जिससे चेतना जागृत हो जाती है । खास कर के , प्रणव के भावपूर्वक जाप से मन अंतर्मुखी हो जाता है और चेतना जागृत होती है । इससे अंततः विघ्न अर्थात योग के पथ की कठिनाइयाँ समाप्त हो जाती हैं ।

व्याधिस्त्यानसंशयप्रमादालस्याविरतिभ्रान्तिदर्शनालब्धभू- मिकत्वानवस्थितत्वानि चित्तविक्षेपास्तेऽन्तरायाः ॥ ३० ॥

व्याधि , स्त्यान , संशय , प्रमाद , आलस्य , अविरति , भ्रांतिदर्शन , अलब्धभूमिकत्व एवं अनवस्थित्व – ये चित्त के विक्षेप ही अंतराय अर्थात विघ्न हैं ।

इस सूत्र में योग के पथ के विघ्नों की बात कही गयी है । ये विघ्न चित्त के विक्षेप हैं , और अंततः क्लिष्ट वृत्तियों को पैदा करते हैं । अतः इनको न उपजने देना योग के फल में सहायता करता है । (1)व्याधि – शरीर, मन एवं चित्त में रोग को व्याधि कहा गया है । व्याधि दुख उत्पन्न करता है , जिससे चित्त चंचल हो जाता है । (2) स्त्यान – योगसाधन में प्रवृत्ति का न होना स्त्यान है । स्त्यान एक प्रकार की अकर्मण्यता है । (3) संशय – योगसाधन के प्रति संदेह हो जाना संशय है । इससे योग के प्रति श्रद्धा कम हो जाती है , एवं योगाभ्यास का कम असर पड्ता है । (4) प्रमाद – योगाभ्यास की प्रवृत्ति होने पर भी उसमें बेपरवाही बरतना प्रमाद है । (5) आलस्य – चित्त में भारीपन हो जाना आलस्य को जन्म देता है । इसमें स्थूल शरीर अभ्यास में बाधा डालता है । (6) अविरति – विषयों के प्रति आसक्ति हो जाने से चित्त में वैराग्य का अभाव हो जाना अविरति है । इस विघ्न में अत्यधिक आसक्ति से मोह उत्पन्न होता है । (7) भ्रांतिदर्शन – भ्रांति का अर्थ है – भ्रमपूर्ण । अर्थात जो सही नहीं हो , उसका सही प्रतीत होना भ्रांतिदर्शन है । (8) अलब्धभूमिकत्व – योग के भूमिकाओ को प्राप्त न कर पाना , अलब्धभूमिकत्व है । इसमें योगी को अभ्यास के बावजूद भी साधना में विकास का अभाव दिखता है । इससे उत्साह कम हो जाता है । (9) अनवस्थित्व – भूमि पर देह स्थिर होने पर भी , चित्त का स्थिर न होना अनवस्थित्व है । इन चितविक्षेपों से योगाभ्यास में विघ्न पैदा होता है ।

योगसूत्र (पतञ्जलि) – प्रथम: समाधिपादः । सूत्र ११ – २0 ।

अनुभूतविषयासंप्रमोषः स्मृतिः ॥ ११ ॥

अनुभव किये हुए विषयों का न छुपना अर्थात प्रकट हो जाना स्मृति है ॥ ११ ॥

स्मृति में पुरानी बातें याद आती हैं । कुछ अनुभव जो कि मस्तिष्क में छुपे हुये हैं , मानस पटल पर प्रकट हो जाते हैं । इनके फलस्वरुप स्मृत्ति वृत्तियाँ पैदा होती हैं ।

अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः ॥ १२ ॥

वृत्तियों का निरोध अभ्यास एवं वैराग्य से होता है ॥ १२ ॥

यह कहने के बाद कि योग चित्त की वृत्तियों का निरोध है , ऋषि पतंजलि ने पाँच वृत्तियों का वर्णन किया । ये वृत्तियाँ हैं – प्रमाण , विपर्यय , विकल्प , निद्रा एवं स्मृति । क्लिष्ट वृत्तियाँ अक्लिष्ट वृत्तियों के द्वारा समाप्त की जा सकती हैं । योगी ऐसा अभ्यास एवं वैराग्य से कर सकता है । अगले सूत्रॉं में अभ्यास एवं वैराग्य की व्याख्या की गयी है ।

तत्र स्थितौ यत्नोऽभ्यासः ॥ १३ ॥

वह अर्थात वृत्तियाँ यत्न पूर्वक अभ्यास से स्थित हो जाती हैं ॥ १३ ॥

यहाँ पर यत्न का अर्थ लगातार प्रयास करने से है । अभ्यास का अर्थ है – किसी कार्य को अनंतर करते रहना ।

स तु दीर्घकालनैरन्तर्यसत्कारासेवितो दृढभूमिः ॥ १४ ॥

और , वह, अर्थात अभ्यास , लम्बे समय तक लगातार आदरपूर्वक करने पर दृढ होते जाता है ॥ १४ ॥

अभ्यास के विभिन्न अंग हैं – दीर्घ काल तक योग करना , योग के प्रति श्रद्धा रखना एवं निरंतर योग करना । ऐसा करने से जिसका अभ्यास किया जाता है , वह दृढ हो जाता है ।

दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य वशीकारसंज्ञा वैराग्यम् ॥ १५ ॥

देखे और सुने हुए विषयों के प्रति तृष्णा , अर्थात लगाव , के अभाव के वशीभूत हो जाना वैराग्य है ॥ १५ ॥

वैराग्य का अर्थ है – राग का अभाव । इन्द्रियों से जब विषयों का अनुभव होता है , तब वो चित्त में राग पैदा करते हैं । व्यक्ति सुख एवं दुख के थपेडे खाते रहता है । वैराग्य का अर्थ है कि विषयों से पैदा होने वाले लगाव को न आने देना । ऐसे लगाव से मोह होता है , जो योगाभ्यास में बाधक है । इसका अर्थ यह भी नहीं है कि विषयों को देखा और सुना न जाये । यह तो अवश्यंभावी है । सिर्फ विषयों के प्रति तृष्णा नहीं होने देना चाहिये ।

तत्परं पुरुषख्यातेर्गुणवैतृष्ण्यम् ॥ १६ ॥

तब परम पुरूष दिखता है , और गुणों से वितृष्णा आ जाती है ॥ १६ ॥

प्रकृति में तीन प्रकार के गुण होते हैं – सत्त्व , रजस एवं तमस। प्रक़ृति को देखने एवं सुनने से विषय मन में तृष्णा पैदा करते हैं । ये तृष्णा व्यक्तिगत गुणों के प्रभाव से उत्पन्न होता है । वैराग्य से इस तृष्णा का नाश होता है । इससे चित्त की वृत्तियाँ समाप्त होने लगती हैं , एवं परम पुरुष दिखने लगता है ।

वितर्कविचारानन्दास्मितारूपानुगमात् संप्रज्ञातः ॥ १७ ॥

सम्प्रज्ञात में वितर्क , विचार , आनन्द एवं अस्मिता का अनुगमन होता है ॥ १७ ॥

सम्प्रज्ञात में चार प्रकार की भावनाएँ है – वितर्क , विचार , आनन्द एवं अस्मिता । वितर्क में बुद्धि तर्क से विषयों का विष्लेषण करती है । विचार में मन विषयों के बारे में सोचता है । सम्प्रज्ञात योग में वितर्क एवं विचार से अक्लिष्ट वृत्तियाँ जन्म लेती हैं । इनसे चित्त में आनन्द का भाव पनपता है । तत्पश्चात अस्मिता का भाव भी आता है , जिसमें आत्मस्वरुप का ज्ञान होने लगता है ।

विरामप्रत्ययाभ्यासपूर्वः संस्कारशेषोऽन्यः ॥ १८ ॥

पहले प्रत्यय में विराम आता है , और सिर्फ संस्कार शेष रहते हैं ॥ १८ ॥

यहाँ पर प्रत्यय का अर्थ विषयों के अनुभव से उत्पन्न होने वाले संचित अनुभव से है । विषय ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा अनुभव किये जाते हैं , और अंतत: चित्त में वृत्तियों को उत्पन्न करते हैं । विषय रुप , शब्द , गंध , स्वाद एवं स्पर्श से उत्प्न्न होते हैं । सम्प्रज्ञात योग के अभ्यास से पहले प्रत्यय समाप्त हो जाता है । इस समय संस्कार विद्यमान होते हैं । संस्कार मनोमय कोश में प्रसुप्त अवस्था में विद्यमान होते हैं । ये विशेष परिस्थिति में व्यक्ति विशेष के स्वभाव में उभर कर आते हैं । संस्कार प्रत्यय से बनता है ।

भवप्रत्ययो विदेहप्रकृतिलयानाम् ॥ १९ ॥

विदेह में , अर्थात देह न रहने , पर भवप्रत्यय प्रकृति में लीन हो जाते हैं ॥ १९ ॥

भवप्रत्यय का अर्थ संचित अनुभवों से है । ये कर्म से प्रभावित होते हैं । ऐसे प्रत्यय मृत्यु के पश्चात भी प्रकृति में विद्यमान रहते हैं । देहावसान के बाद प्रकृति में लीन ये विकार पुनर्जन्म से दूसरे देह में संलग्न हो जाते हैं ।

श्रद्धावीर्यस्मृतिसमाधिप्रज्ञापूर्वक इतरेषाम् ॥ २० ॥

दूसरे योगी श्रद्धा , वीर्य , स्मृति , समाधि एवं प्रज्ञा से होते है ॥ २० ॥

योगी जो विदेह नही हैं , उनके लिये श्रद्धा , वीर्य , स्मृति , समाधि एवं प्रज्ञा का सहारा लेना चाहिये । श्रद्धा से अर्थ है – मन में विश्वास का होना । अगर योग में श्रद्धा न हो , तो योग का असर कम होता है । उसके लिये पहले श्रद्धा बनानी चाहिये । वीर्य का अर्थ मन एवं शरीर के सामर्थ्य से है । सामर्थ्य न हो तो यौगिक क्रियायें नहीं किये जा सकते है । स्मृति से बौद्धिक शक्ति का सामर्थ्य पता चलता है । अगर योग की कोई पद्धति पढी गयी हो तो उसका दिन – रात स्मरण रखना आवश्यक है । समाधि में चित्त से लेकर मन , बुद्धि , प्राण एवं शरीर एक हो जाते है । इस एकता में साक्षात ईश्वर का अनुभव होता है । प्रज्ञा से अर्थ एक ऐसे बुद्धि से है , जिसमें ईश्वर का ज्ञान समाहित हो गया हो । योग से विवेक उत्पन्न होता है । विवेक से ईश्वर ज्ञान होता है , जिससे प्रज्ञा उत्पन्न होता है ।

योगसूत्र (पतञ्जलि) – प्रथम: समाधिपादः । सूत्र १ – १0।

अथ योगानुशासनम् ॥ १ ॥

अब योगानुशासन का प्रारम्भ करते हैं ॥ १ ॥

इस सूत्र से योग एवम अनुशासन के वर्णन को प्रारम्भ करने का संकल्प है ।

योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः ॥ २ ॥

योग चित्त की वृत्ति का निरोध है ॥ २ ॥

आँखें बंद करने पर मानस पटल पर जो दृष्य एवम विचार स्वयं उभरते हैं , वो चित्त की वृत्तियाँ से है । आत्मरुपी भावों से इनका सहज निरोध कर लेना , अर्थात इन भावों को स्वतः रोक लेना योग से सम्भव है ।

तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम् ॥ ३ ॥

उस समय द्रष्टा अपने रुप में स्थिर हो जाता है ॥ ३ ॥

जब चित्त की वृत्तियाँ समाप्त हो जाती हैं , तब द्र्ष्टा को अपना सही रुप दिखायी देता है । यहाँ पर द्रष्टा का अर्थ क्षणिक शारीरिक एवम मानसिक सत्ता से परे पुरूष से है । योग के अभ्यास से स्त्री एवम पुरुष वृत्तियों को समाप्त कर जो सही रुप है , उसको देखना प्रारंभ कर देते हैं ।

वृत्तिसारूप्यम् इतरत्र ॥ ४ ॥

दूसरे समय में वृत्ति के सदृश स्वरुप होता है ॥ ४ ॥

जब चित्त में वृत्तियाँ वर्तमान हों , तो द्र्ष्टा को वृत्ति के द्वारा दिखायी देता है । ये वृत्तियाँ वास्तविक रुप को वैसे ही ढक देती हैं , जैसे कि बादल सूर्य को ढक देते हैं ।

वृत्तयः पञ्चतय्यः क्लिष्टा अक्लिष्टाः ॥ ५ ॥

क्लिष्ट एवम अक्लिष्ट वृत्तियाँ पाँच प्रकार की होती हैं ॥ ५ ॥

वृत्तियाँ पाँच प्रकार की होती हैँ । प्रत्येक प्रकार की वृत्तियाँ के दो भेद बताये गये हैँ – क्लिष्ट एवम अक्लिष्ट । क्लिष्ट वृत्तियाँ चित्त के वृत्तियों को बढाती हैं । अक्लिष्ट वृत्तियाँ क्लिष्ट वृत्तियों को समाप्त कर देती हैं । अतः यदि चिदाकाश में अक्लिष्ट वृत्तियाँ उठें , तो उन्हें अक्लिष्ट वृत्तियों के द्वारा रोका जा सकता है ।क्लिष्ट एवम अक्लिष्ट वृत्तियों का अंतर उनके प्रभाव के द्वारा व्यक्त होता है । क्लिष्ट वृत्तियाँ क्लेश बढाती हैं , और अक्लिष्ट वृत्तियाँ क्लेश को कम करती हैं । अगले छह सूत्रों में पाँच प्रकार की वृत्तियों का वर्णन है ।

प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतयः ॥ ६ ॥

पाँच वृत्तियाँ हैं – प्रमाण , विपर्यय , विकल्प , निद्रा एवम स्मृति ॥ ६ ॥

पाँच प्रकार की वृत्तियों के नाम हैं – प्रमाण , विपर्यय , विकल्प , निद्रा एवम स्मृति ।

प्रत्यक्षानुमानागमाः प्रमाणानि ॥ ७ ॥

प्रत्य़क्ष , अनुमान एवं आगम – ये प्रमाण हैं ॥ ७ ॥

प्रमाणरुपी वृत्तियों को तर्क से सिद्ध किया जा सकता है । प्रमाण तीन प्रकार के हैं – (1) प्रत्यक्ष – जो आँखों के समक्ष हो , वो प्रत्यक्ष है । अगर आग सामने हो तो वो आग है , और मनुष्य को इससे सावधानी बरतनी चाहिये । मृत्यु सुनिश्चत है , और आपके समक्ष हो जाती है । अतः यह प्रामाणिक है कि सबकी मृत्यु होगी । क्लिष्ट प्रत्यक्ष वृत्ति मौत को देख कर भी ऐसा अह्सास देगी कि ऐसे जियो कि जैसे कभी मरोगे ही नहीं । अक्लिष्ट वृत्ति यह अहसास देगी कि मौत तो सुनिश्चित है , अब देर न करो ,कुछ सार्थक काम करो । आँख से रुप , कान से शब्द , नाक से गंध , जिह्वा से रस एवं त्वचा से स्पर्श की तन्मात्राएँ व्यक्त होती हैं और इनसे प्रत्यक्ष अनुभव होता है । योगी को इस अनुभव से कोई चित्तवृत्ति नहीं होती । यदि ये अनुभव क्लिष्ट वृत्तियाँ पैदा करती हों , तो उससे क्लेश होता है । इनको समाप्त करने के लिये अक्लिष्ट वृत्तियों को पैदा करना चाहिये । (2) अनुमान – किसी व्यक्ति को प्रत्यक्ष अनुभव के सहारे अप्रत्यक्ष स्वरुप का ज्ञान होता है , तो वह अनुमान वृत्ति हुयी । धुआँ देखकर जैसे आग का ज्ञान हो , वह अनुमान है । तर्क द्वारा प्रत्यक्ष अनुभवों से अनुमान वृत्ति पैदा होती है । अक्लिष्ट अनुमान वृत्ति के ज्ञान के लिये यह आवश्यक है कि व्यक्तिविशेष को सही ज्ञान हो , और यह अष्टाँग योग के अभ्यास से प्राप्त होता है । (3) आगम – आप्त पुरुषों एवं शास्त्रों के द्वारा प्राप्त ज्ञान आगम वृत्ति है । वेदोपनिषद एवं वेदोपनिषद सम्मत शास्त्र एवं उन योगियों के वचन एवं कर्म जिन्हें प्रत्यक्ष एवं अनुमान के परे ज्ञान हो गया हो अक्लिष्ट वृत्तियों को पैदा करते हैं ।

विपर्ययो मिथ्याज्ञानम् अतद्रूपप्रतिष्ठम् ॥ ८ ॥

दूसरे रुप में प्रतिष्ठित होने का मिथ्या ज्ञान विपर्यय है ॥ ८ ॥

किसी पदार्थ के सही स्वरुप को न देखकर , किसी और रुप को सही मान लेना मिथ्या ज्ञान है । यह वृत्ति प्रायः क्लिष्ट होती है , किंतु कभी – कभी यह मिथ्या ज्ञान अक्लिष्ट वृत्तियों को भी पैदा करता है । विपर्यय वृत्ति से मिथ्या ज्ञान होता है , जो सही रुप के जानने पर नष्ट हो जाता है । जैसे कि यह मानना कि सूर्य ग्रहण राहु के सूर्य निगलने से है , एक विपर्यय वृत्ति है । यह ज्ञान हो जाना कि सूर्य ग्रहण सूर्य एवं पृथ्वी के बीच में चँद्रमा के आ जाने से होता है , इस वृत्ति को समाप्त कर देता है । यह सम्यक ज्ञान प्रमाण वृति से प्राप्त हो जाता है ।

शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्पः ॥ ९ ॥

विकल्प शब्दज्ञान से होता है , वस्तु से नहीं ॥ ९ ॥

विकल्प वृत्ति किसी वस्तु को देखकर नहीं होता । वह शब्दों के ज्ञान से होता है । इसमें शब्दज्ञान के आधार पर मन में वस्तु की कल्पना होती है । इस वृत्ति में वस्तु को कभी देखा नहीं जाता , शब्दों के आधार पर उनका ज्ञान प्राप्त किया जाता है ।

अभावप्रत्ययालम्बना वृत्तिर्निद्रा ॥ १० ॥

निद्रा वृत्ति प्रत्यय अर्थात अनुभव के अभाव पर आधारित है ॥ १० ॥

निद्रा में जागे हुए समय के अनुभव नहीं होते हैं । सोते समय ऐसे अनुभवों का अभाव होता है । परंतु अनियंत्रित मानसिक गतिविधियाँ सोते समय भी होती हैं । इनसे चित्त में क्लिष्ट एवं अक्लिष्ट दोनों प्रकार की वृत्तियों का प्रादुर्भाव होता है । अक्लिष्ट वृत्तियाँ शरीर एवं मन को शांत करते हैं , जबकि क्लिष्ट वृत्तियाँ निद्रा में भी मन को व्याकुल रखती हैं । इन क्लिष्ट वृत्तियों से योगाभ्यास में अडचन पैदा होती है ।